त्रिभंग फिल्म रिव्यू | Tribhanga film review starring Kajol, Tanvi Azmi and Mithila Palkar | Netflix Tribhanga movie review

0
167

कहानी

कहानी

त्रिभंग की कहानी अतीत और आज के बीच घूमती है। राइटर मिलन (कुणाल कपूर रॉय) अपनी आदर्श लेखिका नयनतारा आप्टे (तन्वी आज़मी) की बॉयोग्राफी के लिए उनका इंटरव्यू करते हैं। लेखन के प्रति अपने अटूट लगाव के अलावा नयनतारा अपनी जिंदगी के कई निजी घटनाओं को मिलन के सामने रखती हैं- अपनी टूटी शादियां और इसका उनके बच्चों (काजोल और वैभव तत्ववादी) पर प्रभाव।

अनुराधा (काजोल) एक जानी मानी ओडिशी डांसर और मशहूर अभिनेत्री बन जाती है। वह एक सिंगल मां है, जो शादी को ‘सोसायटल टेरेरिज्म’ मानती है। अपनी मां की तरह वो भी अपनी शर्तों पर जीने वाली महिला है। उसे जो सही लगता है, वो बोलती है, वही करती है। उसकी बेटी है माशा (मिथिला पालकर), जिसके अपने अलग अनुभव हैं। शायद समाज की अपेक्षाओं से घिरे हुए। मैं ‘नॉर्मल’ फैमिली चाहती हूं, वह कहती है।

बनते बिगड़ते रिश्ते

बनते बिगड़ते रिश्ते

अपनी बॉयोग्राफी पर बात करते हुए नयनताया मिलन से कहती हैं- “इतना प्यार है मेरे बच्चों में और इतनी बड़ी खाई उनके और मेरे बीच में। कभी कभी सोचती हूं काश ये मेरे किरदार होते, फिर मैं उन्हें अपनी मनचाही दिशा में ले जाती। और फिर वो मुझसे प्यार करते।” उनकी आवाज़ का दर्द एक एक शब्द में उतर आता है।

कैसे गलत हो गई?

कैसे गलत हो गई?

बॉयोग्राफी पर काम के दौरान ही नयनतारा को ब्रेन स्ट्रोक आता है, और वह कोमा में चली जाती है। यह घटना अनुराधा को अपनी अतीत से जुड़ने के लिए मजबूर करता है.. और वह अपनी मां के साथ अपने समीकरण और जिंदगी को लेकर आत्ममंथन करती है। अपना चुनाव खुद करने की आज़ादी होने के बावजूद भी वे कब, कैसे, कहां गलत हो जाते हैं?

अभिनय

अभिनय

फिल्म में काफी कम किरदार हैं, लिहाजा, हर किरदार आपके दिमाग में जगह बनाता जाता है। तन्वी आज़मी, कुणाल रॉय कपूर से लेकर काजोल, मिथिला.. हर कलाकार शुरु से अंत तक अपनी लय में दिखा है। काजोल कुछ दृश्यों में आवश्यकता से ज्यादा लाउड लगी हैं, लेकिन शायद यही उनके किरदार की मांग थी। तन्वी आज़मी के साथ उनके दृश्य बहुत ही प्रभावी लगे हैं। आप उन्हें स्क्रीन पर और देखना चाहते हैं। शुद्ध हिंदी भाषी राइटर बने कुणाल कपूर रॉय, कंवलजीत सिंह, वैभव तत्ववादी, मानव गोहिल ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

निर्देशन

निर्देशन

बतौर निर्देशक यह रेणुका शहाणे की पहली हिंदी फिल्म है। आजकल महिला द्वारा, महिला की कहानी कहने का ट्रेंड काफी देखा जा रहा है। शायद इसीलिए त्रिभंग में भी कुछ ऐसी भावनाओं को, दिल के कुछ ऐसे तार को छेड़ा गया है, जो बॉलीवुड फिल्मों में ज्यादा देखा नहीं गया है। एक दूसरे की गलतियों को समझने, साथ देने के साथ साथ अपने अलग रास्ते चुनने की इस कहानी को पर्दे पर बेहतरीन उतारा गया है।

फिल्म एक मिनट के लिए भी विषय से भटकती नहीं है। महिलाओं को लेकर सामाजिक पूर्वधारणा, घरेलू हिंसा, परिवार में हो रहे शारीरिक शोषण जैसे विषयों को भी निर्देशक ने संवेदनशीलता के साथ छुआ है। ‘त्रिभंग’ महज डेढ़ घंटे की है और यह बात फिल्म के पक्ष में जाती है।

क्या अच्छा

क्या अच्छा

फिल्म की स्टारकास्ट, निर्देशन और लेखन इसके मजबूत पक्ष हैं। तन्वी आज़मी के कुछ संवाद दिल को छूते हैं। उनका किरदार भले ही दोष रहित नहीं है, लेकिन नयनतारा से नफरत नहीं होती है। प्रतिभा, जिद, परंपरा के बीच बंटी इन तीन महिलाओं की जिंदगी पर्दे पर कहीं भी ऊबाऊ नहीं लगती है। फिल्म के एडिटर ज़बीन मर्चेंट का काम भी सराहनीय है।

क्या बुरा

क्या बुरा

जिस तरह की भावनाओं को फिल्म में समेटा गया है, कुछ दृश्यों में शब्दों की जगह खामोशी का आभास ज्यादा प्रभावशाली लग सकता था। लेकिन वो वहां मिसिंग है। शायद इसीलिए कहानी से जुड़ने के बावजूद फिल्म खत्म होने के बाद ज्यादा देर तक प्रभाव नहीं छोड़ती।

देखें या ना देंखे

देखें या ना देंखे

मां- बेटी से ज्यादा तीन महिलाओं के बीच बनते बिगड़ते रिश्ते यह कहानी एक बार जरूर देखी जानी चाहिए। निर्देशक रेणुका शहाणे ने ‘त्रिभंग’ में मुद्दों के साथ साथ भावनाओं को अहम जगह दी है और यही बात दिल को छूती है। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3.5 स्टार।