Bell Bottom Review & Rating starrer Akshay Kumar vaani kapoor raw agent & plane hijack story | अक्षय कुमार की फिल्म बेल बॉटम का रिव्यू

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कहानी

कहानी

ये साल 1984 की कहानी है, जब चार सालों के अंदर कई बार भारत का प्लेन हाईजैक होने की घटना को समेटे हैं। 210 पेसेंजर से भरी एयर इंडिया की फ्लाइट को कुछ आंतकवादियों ने हाइजैक कर लिया। देश में इस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कार्यकाल था। कहानी में पूर्व प्रधानमंत्री का किरदार इस तरह से दिखाया गया है कि फिल्म राजनीति का शिकार न हो जाए। इंदिरा गांधी के दमदार फैसलों और रणनीति के साथ रॉ की सफलता को इस कहानी को पिरोया गया है। फिल्म की कहानी के मजबूत पक्ष की बात करें तो बेल बॉटम में सरलता के साथ बिना किसी हो हल्ला के इस विषय को पर्दे पर उकेरा गया है। फिल्म में अफसरों, मंत्रियों और रॉ-आईबी एजेंट्स की हाई लेवल की मीटिंग्स के साथ अक्षय कुमार का खुद से 21 साल छोटी वाणी कपूर के साथ रोमांस देखने को मिलेग। तो वहीं मां बेटे के प्यार के जरिए फिल्म को इमोशनल एंगल देने की कोशिश भी गई है। कुल मिलाकर आपको उतनी ही कहानी बेल बॉटम में देखने को मिलेगी जितना आपने ट्रेलर में देखा है।

अभिनय

अभिनय

अक्षय कुमार, वाणी कपूर, लारा दत्ता, आदिल हुसैन व हुमा कुरैशी समेत कई कलाकारों से सजी इस फिल्म में सबसे ज्यादा जोर आदिल हुसैन ने लगाया है। जिनके कंधे पर इस फिल्म की काफी जिम्मेदारी थी और उन्होंने उसे सबसे शानदार तरीके से निभाया। वहीं वाणी कपूर ने अक्षय कुमार की पत्नी का किरदार निभाया। उनके अभिनय की बात करें तो अपनी पुरानी फिल्मों की तरह नजर वह आईं। फिल्म के लीड हीरो अक्षय कुमार के अभिनय ने एक बार फिर दर्शकों को इंप्रेस किया है। वह हर बार की तरह इस बार भी मजबूत अंदाज में नजर आए। किरदार में एकदम फिट भी बैठे और उन्होंने अपने किरदार को पकड़े रखा।

वाणी कपूर व फिल्म के किरदारों का ढांचा कमजोर दिखाई पड़ता है। जिसकी वजह से कलाकारों के पास ज्यादा स्कोप ही नहीं दिखा। फिल्म में रॉ की पूरी टीम ने इस ऑपरेशन में शानदार काम किया और उन्हें पर्दे पर बराबर दिखाया जाना चाहिए था लेकिन लेखक व निर्देशक का पूरा फोकस अक्षय कुमार पर रहा। ऐसा लगता है जैसे पर्दे पर सिर्फ अक्षय कुमार को चिपकाए रखा गया है। हुमा कुरैशी का रोल छोटा जरूर था लेकिन शानदार और मजबूत था लेकिन निर्देशक अन्य कलाकारों की तरह इसे भी निखार नहीं पाए।

 पटकथा

पटकथा

वहीं प्लेन हाईजैक की कहानी के बीच में राइटर ने रोमांस, एक्शन, मां-बेटे का प्यार और थ्रिलर सब डालने की कोशिश की है। लेकिन ये सब कोशिश सिर्फ और सिर्फ अक्षय कुमार तक ही सीमित हो जाती हैं। लेखक ने फिल्म की कहानी की रूपरेखा अच्छी तैयारी की, लेकिन तमाम उतार चढ़ाव इसमें देखने को मिलते हैं। पटकथा को थोड़ा कसा जाने की आवश्यकता थी। वहीं अन्य कलाकारों को स्पेस दिया जाता तो ये फिल्म औसत न होकर ब्लॉकबस्टर हो सकती थी।

 निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

बेल बॉटम फ़िल्म का निर्देशन रंजीत एम तिवारी ने किया है। रंजीत इससे पहले लखनऊ सेंट्रल जैसी दमदार फ़िल्म का निर्देशन कर चुके हैं, हालांकि वे कई फ़िल्में का सह निर्देशन कर चुके हैं। बेल बॉटम फ़िल्म 80 के दशक में फ़िल्माई गई फ़िल्म है। फ़िल्म को देखने से यह तो साफ़ पता चलता है कि रंजीत तिवारी ने हर छोटी छोटी बारीकियों पर काम किया है। जैसा कि फ़िल्म के शुरूआत में बताया गया है कि यह फ़िल्म सच्ची घटना पर आधारित जिसे फिक्शनलाइज कर दर्शकों के सामने सौंपा गया है।

फ़िल्म को देखने पर महसूस होता है कि यह फ़िल्म एक किरदार के आसपास घूमती है। इस फ़िल्म में अक्षय कुमार की जरूरत से ज्यादा मौजूदगी फ़िल्म के पटकथा को कमजोर करती है। कई बार ऐसे मौक़े आते हैं जब अक्षय कुमार के किरदार को बिना मतलब जीनियस दिखाने की कोशिश की गई है। इस फ़िल्म में अक्षय कुमार के साथ साथ आदिल हुसैन, हुमा क़ुरैशी जैसे कई काबिल एक्टर शामिल हैं, जिनके किरदार को काफ़ी छोटा रखा गया है।

फ़िल्म के कई सीन आपको झकझोरने में कामयाब रहते हैं और आपको इमोशनल करते हैं। हर सीन को बारीकी से फ़िल्माया गया है। फ़िल्म शुरू होने से ख़त्म होने तक आप उस थ्रिलिंग मोमेंट के इंतज़ार में रहते जो आपके रोंगटे खड़े कर दे, लेकिन दुर्भाग्य से ये पल नहीं आता है। जैसे ही फ़िल्म में क्लाइमैक्स की एंट्री होती है उतनी ही जल्दी न्यूट्राइज भी हो जाता है। एयरपोर्ट में रेतीले तूफ़ान का एक्शन सीन को जैसे फ़िल्माया गया है उसे ज़्यादा ड्रामा और एक्शन के साथ फ़िल्माया जा सकता है। यह सीन फ़िल्म का क्लाइमैक्स है लेकिन यह क्लाइमैक्स वाला एक्सपीरियंस नहीं देता है।

80 के दशक की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म में उन सभी बातों जैसे कॉस्ट्यूम, फ़ैशन और मेकअप के साथ साथ इंक्यूपमेंट और सेट को खासतौर पर ध्यान रखा गया है। मेकअप की बात करें तो लारा दत्ता को जिस तरह से इंदिरा गांधी के गेट-अप दिया गया है वह वाक़ई में क़ाबिले तारीफ़ है। लारा दत्ता को इंदिरा गांधी के रूप में दिखाने के लिए निश्चित तौर पर रंजीत तिवारी शाबासी के हक़दार हैं।

फ़िल्म क्यों देखें

फ़िल्म क्यों देखें

इस फ़िल्म को क्यों देखा जाए तो इसका एक उतर देशभक्ती है।यह एक ऐसी ही कहानी है, जिसमें भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ पहली बार क्रॉस बॉर्डर कॉवर्ड मिशन को अंजाम देती है। फिल्म में खून खराबा व फातलू की मार-धाड़ भी नहीं है। इसके साथ ही अगर आप अक्षय कुमार के फ़ैन है तो यह फ़िल्म आपको ज़रूर देखनी चाहिए।

कमजोर पक्ष

कमजोर पक्ष

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि फिल्म एक घटना पर कम और एक व्यक्ति के जीवन पर ज्यादा आधारित लगती है। फिल्म शानदार हो सकती थी लेकिन कुछ कमियों की वजह से फ्लैट लगती हैं। फिल्म में थ्रिलर और एक्शन भी कम देखने को मिलता है।